Thursday, May 26, 2011

CXØfSX ´fýiZVf IZY dÀfa·ff½f»fe ¸fZÔ EIY Àff²ffSX¯f dIYÀff³f ´fdSX½ffSX ¸fZÔ ªf³¸fZ ½f dQ»»fe d½fIYfÀf ´fifd²fIYSX¯f ¸fZÔ 12 Àff»f °fIY ¸ff¸fc»fe ³füIYSXe IYSX³fZ ½ff»fZ ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ IYf OXeOXeE IZY Àf½fZʹfSX ÀfZ dQ»»fe d½f²ff³fÀf·ff °fIY IYf ÀfRYSX dªf°f³ff SXû¨fIY SXWXf W`X CX°f³ff WXe IYdNX³f ·feÜ ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ ÀfZ ªf¶f ¸f`³fZ ¶ff°f¨fe°f IYe VfbøYAf°f IYSX°fZ WbXE ¸f`³fZ ¸f°fe³f AWX¸fQ ÀfZ ´fcLXf IYe Af´fIYf ¶f¨f´f³f I`YÀfZ ¶fe°ff ,BXÀf Àf½ff»f IZY ªf½ff¶f ¸fZÔ ¸f°fe³f AWX¸fQ ³fZ ´fbSXf³fZ dQ³fûÔ IYû ¹ffQ IYSX°fZ WbXE ¶f°ff¹ff dIY WX¸ffSXf ´fdSX½ffSX ¶fZWXQ Àff²ffSX¯f ±ffÜ §fSX ¸fZÔ IYûBÊX £ffÀf Àfb£f Àfbd½f²ff ³fWXeÔ ±fe £û°fe¶ffOÞXe IYf ÀffSXf IYf¸f £fbQ IYSX³ff ´fOÞX°ff ±ffÜ ¹fWX Àf¶f ¶f°ff°fZ WbXE ¸f°fe³fAWX¸fQ IZY ¨fZWXSmX ´fSX ¦f½fÊ IZY ªfû ·ff½f Af SXWZX±û CÀfÀfZ ÀffRY ±ff dIY ¸f°fe³f AWX¸fQ A´f³fZ A°fe°f ÀfZ Vfd¸fÊaQf ³fWXeÔ ¶fd»IY A´f³fZ A°fe°f IYû ÀfªfûÔ³fZ ½ff»fZ BaXÀff³f W`Xܸf`³fZ ¸f°fe³f AWX¸fQ ÀfZ A¦f»ff Àf½ff»f dIY¹ff dIY SXfªf²ff³fe ¸fZÔ I`YÀfZ Af³ff WbXAf Ü ¸f°fe³f AWX¸fQ IYf ªf¶ff½f ±ff dIY ¸fZSXe ³füIYSXe OXeOXeE ¸fZÔ ¶f°füSX Àf½fZʹfSX »f¦f ¦fBÊX ±fe Ü BXÀfIZY ¨f»f°fZ ¸f`Ô SXfªf²ff³fe ¸fZÔ Af ¦f¹ff Ü ¹fWX Àfb³fIYSX ¸f³f ¶fOÞXf CX°ÀfbIY WbXAf ¹fWX ªff³f³fZ IYû dIY OXeOXeE IZY Àf½fZʹfSX ÀfZ »fZIYSX d½f²ff¹fIY °fIY IYf ÀfRYSX I`YÀfZ °f¹f dIY¹ff Ü ¸f`³fZ A´f³fe CX°ÀfbIY°ff IYû Vffa°f IYSX³fZ IZY d»fE ¸f°fe³f AWX¸fQ ÀfZ BXÀf Àfa¶fa²f ¸fZÔ ´fcLX d»f¹ff dIY SXfªf³fed°f ¸fZÔ I`YÀfZ AfEÜ ¸f°fe³f AWX¸fQ ³fZ ªf¶ff½f dQ¹ff dIY OXeOXeE ¸fZÔ ¸fZSXe ³füIYSXe 1981 ¸fZÔ »f¦fe ±fe Ü ¸fZSmX Àff±f ªf³f°ff Q»f IZY ½fdSX¿NX ³fZ°ff SXf¸f½feSX dÀfaWX d½f²fbOXÞe IYZ ·ffBÊX ·fe ³füIYSXe IYSX°fZ ±ûÜ BXÀf ³ff°fZ ¸fZÔ SXf¸f½feSX dÀfaWX d½f²fbOÞXe IZY §fSX ¸fZSXf Af³ff ªff³ff ·fe ±ffÜ 1991 ¸fZÔ ªf¶f SXf¸f½feSX dÀfaWX d½f²fbOÞXe ³fZ ¨fb³ff½f »fOÞXf °fû SXf¸f½feSX dÀfaWX IZY ·ffBÊX ³fZ ¨fb³ff½f ´fi¨ffSX IZY ´fi¶fa²f³f ¸fZÔ ¸fZSXe ¸fQQ »fe Ü ¸f`³fZ CXÀf ¨fb³ff½f ¸fZÔ IYfRYe ¸fZWX³f°f IYe ½f SXf¸f½feSX dÀfaWX IYû ·ffSXe ¶fWbX¸f°f d¸f»ff Ü BXÀfIZY ¶ffQ ªf¶f 1993 ¸fZÔ dQ»»fe d½f²ff³fÀf·ff ¨fb³ff½f WXû³fZ IYe §ûf¿f¯ff WbXBÊX °fû SXf¸fd½fSX dÀfaWX ³fZ ¸fbÓfZ Àfe»f¸f´fbSX d½f²ff³fÀf·ff ÀfZ ¨fb³ff½f »fOÞ³fZ dIY dªf¸¸fZQfSXe »fZ³fZ IZY d»fE IYWXf Ü EIY Àff²ffSX¯f dIYÀff³f ´fdSX½ffSX ¸fZÔ ªf³¸fZ ½f Àff¸ff³¹f W`dÀf¹f°f ½ff»fZ AfQ¸fe IZY d»fE ¹fWX EIY ¶fOÞXf ¸füIYf ±ff Ü ¸f`³fZ BXÀf Àfa¶fa²f ¸fZÔ A´f³fZ ´fdSX½ffSX ÀfZ ¶ff°f IYe °fû VfbøYAf°fe d½fSXû²f IZY ¶ffQ ¸fZÔ °f`¹ffSX WXû ¦fE Ü ¸f`³fZ BXÀfIZY ¶ffQ Àfe»f¸f´fbSX ÀfZ d½f²ff³fÀf·ff ¨fb³ff½f »fOÞXf ½f dªfÀf¸fZ ¸f`a d½fªf¹f WbAf Ü BXÀfIZY ¶ffQ ÀfZ »fZIYSX A¶f °fIY ¸f` Àfe»f¸f´fbSX d½f²ff³fÀf·ff ÃûÂf IZY »fû¦fûÔ IYe d½f²ff³fÀf·ff ¸fZÔ Af½ffªf ¶fb»faQ IYSX°ff Af SXWXf WbaXÜ ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ IZY SXfªf³fed°f ÀfRYSX IYe IYWXf³fe Àfb³fIYSX IYfRYe W`XSXf³fe ½f £fbVfe WbXBÊX Ü W`XSXf³fe BXÀfd»fE dIY SXfªf³fed°fIY A³fb·f½f ³fWXeÔ WXû³fZ IZY ¶ff½fªfcQ ¸f°fe³f AWX¸fQ ³fZ OXeOXeE IYe ³füIYSXe LXûOÞX ¨fb³ff½f »fOÞX³fZ IYe dWX¸¸f°f dQ£ffBÊX ½f ªfe°fZ Ü £fbVfe BXÀfd»fE WbXBÊX dIY EIY Àff²ffSX¯f dIYÀff³f ´fdSX½ffSX IYf ¶fZMXf d½f²ff¹fIY ¶f³ff Ü BXÀf °fSXWX IZY CXQfWXSX¯f ÀfZ Af¸f AfQ¸fe IYe AfÀ±ff »fûIY°faÂf ¸fZÔ ¶f³fe SXWX°fe W`XÜ ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ IZY ´fdSX½ffSX ¸fZÔ ´f}e ½f °fe³f ¶fZMZX ,Qû³fû ¶fOZÞX ¶fZMZX A´f³ff IYfSXû¶ffSX IYSX°fZ WZX ½f LXûMXf ¶fZMXf ´fÂfIYfSXe°ff ¸fZÔ ·fd½f¿¹f ¶f³ff³fZ IZY d»fE ´fPXfBÊX IYSX SXWXf W`XÜ ¸f`³fZ ¶ff°f¨fe°f IZY dÀf»fdÀf»fZ IYfZ Af¦fZ ¶fPÞXf°fZ WbXE ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ ÀfZ ´fcLXf dIY Af´f ³fZ EIY A»f¦f SXfªf³fed°fIY ´fWX¨ff³f ¶f³ffBÊX W`X ,¢¹ff Af´f ·fe QcÀfSmX ³fZ°ffAûÔ IYe °fSXWX A´f³fZ ¶fZMXûÔ IYû SXfªf³fed°f ¸fZÔ »ff³ff ¨ffWZX¦fZÔÜ BXÀf Àf½ff»f IZY ªf¶ff½f ¸fZÔ ¸f°fe³f AWX¸fQ ³fZ ªfû IYWXf CXÀfÀfZ ´f°ff ¨f»f°ff W`X dIY ¨fü²fSXe ¸f°fe³f AWX¸fQ ¨ffSX ¶ffSX d½f²ff³fÀf·ff ¨fb³ff½f I`YÀfZ dªf°fZ W`X ½f WXSX¶ffSX CX³fIZY CX³fIYû d¸f»f³fZ ½ff»fZ ½fûMXûÔ IYe Àfa£¹ff I`YÀfZ ¶fPÞX ªff°fe W`XÜ ¸fZSmX Àf½ff»f IZY ªf¶ff½f ¸fZÔ ¸f°fe³f AWX¸fQ ³fZ IYWXf dIY A¦fSX ¸fZSXf ¶fZMXf SXfªf³fed°f ¸fZÔ AfE¦ff °fû A´f³fZ Q¸f ´fSX ¸f` IY·fe CX³fIZY d»fE ´f`SX½fe ¹ff dMXIYMX dQ»f½ff³fZ IZY d»fE ªfQQûªfWXQ IY÷Y¦ffaÜ ¸f°fe³f AWX¸fQ IYf IYWX³ff W`X dIY A¦fSX ³fZ°ff A´f³fZ ´fdSX½ffSX ÀfZ dIYÀfe IYû dMXIYMX dQ»f½ff°ff W`X °fû ¹fWX IYf¹fÊIY°fûÊAûÔ IZY Àff±f A³¹ff¹f WXû°ff W`XÜ

सर्वजन हिताय lalsingh


सर्वजन हिताय की दम भरने वाली मायावती के पास प्रदेश के आम आदमी के लिए समय नहीं है, इसीलिए तो संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलीक अधिकार का हनन करने से भी वो बाज नहीं आई हैं।

प्रदेष में धरना, प्रदर्शन के लिये बने नये कानून से पूर्व एक साधारण अर्जी के द्वारा प्रशासन से धरना, प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने का प्रावधान था। सालों-साल से यही व्यवस्था प्रदेश में लागू थी। साधारण मामलों में नियमानुसार डीएम ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति अपने स्तर से देते थे कोई बड़ा कार्यक्रम होने की सूरत में डीएम स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) से रिपोर्ट लेकर फैंसला करते थे। अमूमन थोड़ी बहुत हिदायत और निर्देश के साथ अकसर अनुमति मिलने में कोई परेशानी पेश नहीं आती थी। लेकिन नये नियमों के तहत धरना, प्रदर्शन या आंदोलन के लंबा-चैड़ा फार्म भरने से लेकर कई विभागों से एनओसी प्राप्त करने का प्रावधान है। ऐसे में ये सवाल जहन में उठता है कि आखिकर एकाएक माया सरकार में दिमाग में धरना, प्रदर्शन के लिए कानून बनाने का सुझाव क्यों आया। दरअसल इंडिया अंगेस्ट करप्शन की बैनर तले अन्ना हजारे के यूपी में प्रस्तावित दौरे से घबराई माया सरकार ने आनन-फानन में 27 अप्रैल को धरना, प्रदर्शन और जुलूस के आयोजन के लिए सरकारी आदेश जारी कर अन्ना के कार्यक्रमों में अडंगा लगाने का षडयंत्र रचा था। माया सरकार की किस्मत अच्छी थी कि खराब स्वास्थ्य के चलते अन्ना वाराणसी, सुलतानपुर और लखनऊ में आयोजित होने वाली रैलियों में हिस्सा नहीं ले पाये थे। सरकारी मशीनरी को अन्ना के न आने की पुख्ता खबर मिलते ही सरकार ने वाहवाही लूटने के लिए अन्ना की टीम को कार्यक्रमों को मंजूरी देकर अन्ना का साथ देने का ड्रामा किया। अन्ना के न आने से यूपी की रैलियों में अपेक्षा से काफी कम भीड़ आने की वजह से अफसरों की बांछे खिली हुई थी और मायावती भी टेंशन फ्री थी।

नये कानून के अनुसार उत्तर प्रदेश में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, रैली आदि के आयोजन के लिए आयोजकों को अब कम से कम सात दिन पहले प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित आवेदन देकर इसकी अनुमति हासिल करनी होगी। जिला प्रशासन ऐसे आयोजनों की वीडियोग्राफी भी करायेगा। ऐसे आयोजनों के दौरान सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति की क्षति होने पर आयोजक से क्षतिपूर्ति की वसूली करने के साथ उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जाएगी। राजनीतिक दलों के आयोजनों में निजी संपत्ति की क्षति होने पर उसकी वसूली दल के जिला, प्रदेश व राष्ट्रीय अध्यक्ष से होगी। सामाजिक, धार्मिक तथा अन्य आयोजनों की जिम्मेदारी संस्था के मुख्य पदाधिकारी की होगी। भुगतान न करने की दशा में क्षतिपूर्ति की राशि भू-राजस्व के बकाये की भांति की जायेगी। सरकार का पक्ष है कि धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस, आदि को लेकर कई बार अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को क्षति बनाम आंध्र प्रदेश सरकार व अन्य रिट याचिका की सुनवाई करते हुए 16 अप्रैल 2009 को पारित अपने आदेश में व्यापक दिशानिर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में व्यक्त की गईं अवधारणाओं के क्रम में राज्य सरकार ने 27 अप्रैल 2011 को दिशानिर्देश जारी करते हुए का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया है। अनुपालन न कराने पर अफसरों के खिलाफ कठोर कार्यवाही होगी। शासनादेश के मुताबिक ऐसे आयोजनों में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रतिबंधित रहेंगे। जिला मजिस्ट्रेट जिले में ऐसे धरना-प्रदर्शन स्थलों को निर्धारित करके उनका व्यापक प्रचार प्रसार करायेंगे, ताकि जनता को इसकी जानकारी हो सके। तहसील स्तरीय धरना-प्रदर्शन की अनुमति उप जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट देंगे। जिला मुख्यालय स्तरीय धरना-प्रदर्शनों की अनुमति जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट, सिटी मजिस्ट्रेट, उप जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी की जाएगी। इन आयोजनों के बारे में संबंधित थाने, स्थानीय अभिसूचना इकाई और अन्य विभागों से रिपोर्ट हासिल कर निर्धारित प्रारूप पर अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा धरना-प्रदर्शन, हड़ताल या जुलूस का आयोजन करने वाले पुलिस व प्रशासन से विचार विमर्श करने के बाद ऐसे आयोजन का स्थल, मार्ग, समय, पार्किंग और अन्य शर्तें तय करेंगे। सड़क या रेल मार्ग से आने वाली जनता के आवागमन के लिए बारे में संबंधित विभाग से समय से संपर्क कर सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करायी जाएगी। आयोजक यह भी अंडरटेकिंग देंगे कि उनकी हड़ताल या धरना-प्रदर्शन शांतिपूर्ण होंगे।

माया सरकार के इस तुगलकी फरमान ने इमरजेंसी के दिनों की याद ताजा करवा दी है। वहीं सरकार का यह कदम देश के आम आदमी को संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन करता है। विरोधी दलों ने सरकार के नादिरशाही फरमान की घोर निंदा की है लेकिन हमेशा की तरह माया की कान पर जूं तक नहीं रेंगी। असल में मायावती भलीभांति ये जानती है कि उनके मंत्रियों और चम्मचों के कुकृत्यों के कारण ही उनकी सरकार की छवि को गहरी धक्का लगा है। सरकार डेमेज कंट्रोल की कार्रवाई तो कर रही है लेकिन जो बदनामी होनी थी वो तो हो चुकी। ऐसे में आगामी निकाय चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार विपक्षी दलों के लिए माया के विरूद्व सबसे बड़ा हथियार होगा। ऐसे में विपक्षी दल मायावती सरकार की काली तस्वीर प्रदेश की जनता के सामने रखेंगे तो चुनावों में तस्वीर बदल भी सकती है। बसपा सरकार के विधायकों और मंत्रियों के कारनामें प्रदेश के आम आदमी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में विरोधी दलों के लगातार तीखे तेवरों, धरने, प्रदर्शनों और आंदोलनों से घबराई माया सरकार ने अपने चिर परिचित अंदाज में अपने विरोधियों और आम आदमी के स्वर को दबाने के लिए कानून की आड़ ली है। सरकार और उसके पालतू सरकारी अमला इस कानून को लागू करने के पीछे मानीनय सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के आदेशों की दुहाई दे लेकिन मायावती सरकार और उनके चम्मचे माननीय न्यायालयों की आदेशों के पालन में कितने गंभीर हैं ये बताने की बात नहीं है। पिछले चार सालों में कई मौकों पर माया सरकार ने न्यायालय के आदेशों की अवेहलना और अवमानना की है। जाट आरक्षण आंदोलन के तहत न्यायालय के आदेश के उपरांत भी प्रदर्शनकारियों को रेल ट्रैक से न हटाने की जो हिमाकत माया सरकार ने की थी वो सरकार की नीति और नीयत को भली-भांति दर्शाता है।

लोकतंत्र की खासियत ही यही है उसमें नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार मिला होता है। और जनता संविधान प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग कर सरकार के समक्ष अपनी समस्याएं, मांगे और विभिन्न मसलों के लिए आवाज बुलंद करती है। और सरकार के गलत कदमों और जन विरोधी कामों के लिए धरने, प्रदर्शन और आंदोलनों के माध्यम से कान में तेल बैठी सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाती है लेकिन माया सरकार को प्रदेश के आम आदमी से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्ता के मद में चूर मायावती के लिए आम आदमी के दुःख-दर्दे और समस्याएं शायद कोई मायने नहीं रखती हैं। अंदर ही अंदर माया सरकार के प्रति जनता के मन में गुस्सा भर चुका है और स्वयं माया भी इस बात से अंजान नहीं है। मार्च महीने में प्रदेश के समस्त जिलों के दौरे पर निकली सीएम मायावती को कई स्थानों पर जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था, उस वक्त भी सरकार ने सुरक्षा का बहाना बनाकर सीएम के दौरे के दौरान नागरिकों को घरों में बंधक बनाकर जनता के गुस्से से बचने की कोशिश की थी। पिछले कुछ समय में माया सरकार के विरूद्व राजनीतिक, सामाजिक, व्यापारिक, शिक्षकों या फिर वकीलों का स्वर उभरा तो उसे दबाने के लिए सरकारी मशीनरी ने मानवाधिकार के हनन में से भी कोई परहेज नहीं किया। दरअसल 2007 में बहुमत मिलने के बाद से ही मायावती ने आम आदमी से दूरी बनाई हुई है। अगर बसपा सरकार के कामों का पिछले चार सालों का रिर्काड खंगाला जाए तो पार्टी की दो-चार बड़ी रैलियों और जनसभाओं के अलावा सूबे के आमजन से संपर्क करने की कोई कोशिश मायावती ने नहीं की है। सत्ता के नशे में चूर मायावती को लगता है कि उनका सिंहासन हिलाने की ताकत किसी में नहीं है। और शुरू से अपनी दबंग छवि और कारनामों के लिए मशहूर मायावती को कानून तोड़ने और उसे मनमाफिक बनाने में मजा आता है। धरना, प्रदर्शन का कानून बनाने से पूर्व माया सरकार राज्य अतिथि नियमावली में भी फेरबदल कर चुकी है ताकि केन्द्रिय मंत्रियों को उनकी औकात बताई जा सके। पिछले विधानसभा चुनावों में भी बसपा को बहुमत मिलना बिल्ली के हाथों छीका टूटने से अधिक नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि बसपा ने कोई बड़ा सामाजिक परिवर्तन और जन कल्याण किया हो। सपा और उसकी पूर्ववर्ती सरकारों से त्रस्त जनता ने ब्राहाण-दलित गठजोड़ को तरजीह दी और मायावती को बहुमत मिल गया। लेकिन बहुमत मिलने के बाद सबसे पहले माया ने उस आम आदमी से दूरी बनाई जिसने उसे बहुमत दिलाया था। किसी जमाने में प्रदेश में सीएम जनता दरबार के माध्यम से प्रदेश की जनता से रूबरू होते थे लेकिन माया सरकार में किसी को जनता दरबार में ये व्यवस्था लागू नहीं है। सरकार के अदने से अधिकारी से मिलने के लिए आपको सैंकड़ों पापड़ बेलने पड़ते हैं ऐसे में सीएम से मिलना तो बडे़-बड़ों की औकात से बाहर है। चुनावी बेला सिर पर है और ऐसे में माया हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है क्यों वो जानती है कि उनका एक भी गलत कदम उन्हें सत्ता से दूर कर सकता है और विपक्षी भी उनकी सरकार को पटकनी देने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। ऐसे में अपने विरोधियों से निपटने के लिए माया सरकार ने धरना, प्रदर्शन नियमावली बनाकर लोकतंत्र का गला घोंटने का प्रयास किया है। क्यों कि माया को भली भांति मालूम है उनके खाते में स्मारक, पार्क, मूर्तियां लगाने के अलावा कोई और बड़ी उपलब्धि शामिल नहीं है।

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि धरने, प्रदर्शन और आंदोलनों के दौरान होने वाली हिंसा और तोड़-फोड़ से देश की सम्पत्ति को हानि पहंुचती है लेकिन अहिंसक तरीके से अपनी आवाज को सरकार के सामने रखने में कोई बुराई नहीं है। कानून की आड़ में माया सरकार धरने, प्रदर्शनों और आंदोलनों का गला घोंटना चाहती है। जैसे इस बात की कोई गांरटी नहीं ले सकता है कि हिंसा और तोड़-फोड़ नहीं होगी क्योंकि बहुत सी घटनाएं परिस्थितिवश भी घटित हो जाती हैं। वहीं माया सरकार के पालतू और चम्मच अफसर धरने, प्रदर्षन के दी गई अप्लीकेशन को फाइलों में दबाने में कोई कोर कसर नही छोंडेगे इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। मायावती को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में लोक ही असली राजा होता है और चुनावों के समय तंत्र को असली राजा के सामने हाथ जोड़ने होते हैं ऐसे में माया सरकार प्रदेश के आम आदमी की आवाज दबाने की जो गलती कर रही है उसका खामियाजा उसे भुगतना ही होगा। और अगर मायावती ये चाहती है कि कोई उनकी सरकार की बुराई और विरोध में न उतरे तो वो स्वयं आगे बढ़कर आम आदमी के दुःख-दर्दे को समझने, जानने और उसे सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं करती है।